मध्य प्रदेश, जिसे “नदियों का मायका” कहा जाता है, अपनी जीवनदायिनी नर्मदा नदी के जल का उपयोग कर विकास की नई इबारत लिखने को तत्पर है। इसी कड़ी में, नर्मदा घाटी में आकार ले रही चिंकी-बोरस बैराज संयुक्त बहुउद्देशीय परियोजना एक ऐसी ही महत्वाकांक्षी योजना है, जो प्रदेश के तीन जिलों – नरसिंहपुर, रायसेन और होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) – की कृषि और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का वादा करती है। लगभग 5839.32 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत वाली यह परियोजना जहाँ एक ओर सिंचाई और बिजली उत्पादन के माध्यम से खुशहाली लाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर, इसके निर्माण से प्रभावित होने वाले सैकड़ों गाँवों, विशेषकर नर्मदा किनारे बसे आदिवासी और पारंपरिक समुदायों के बीच विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और भविष्य को लेकर गहरी चिंताएँ और विरोध के स्वर भी उतने ही मुखर हैं। यह लेख इस परियोजना के हर पहलू, इसके इतिहास, तकनीकी विशिष्टताओं, लाभों और इससे जुड़े जटिल सामाजिक-आर्थिक विवादों का एक विस्तृत और गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
परियोजना का वृहद स्वरुप: दो बैराज, तीन जिलों की आशा
चिंकी-बोरस परियोजना कोई एकल संरचना नहीं, बल्कि दो अलग-अलग, फिर भी एकीकृत बैराजों का एक संयुक्त उद्यम है, जिसे नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA) द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
- चिंकी बैराज: यह बैराज नर्मदा नदी पर नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील के पास, पिपरहा और हीरापुर जैसे गाँवों के निकट बनाया जा रहा है। यह परियोजना का पहला प्रमुख घटक है।
- बोरस बैराज: यह चिंकी बैराज से लगभग 67 किलोमीटर नीचे की ओर (डाउनस्ट्रीम) रायसेन जिले की उदयपुर तहसील के बोरस और चौरास गाँवों के पास निर्माणाधीन है।
परियोजना के मुख्य स्तंभ: सिंचाई, बिजली और आधुनिक तकनीक
इस बहुउद्देशीय परियोजना के लक्ष्य बहुआयामी हैं, जिनका उद्देश्य क्षेत्र के आर्थिक परिदृश्य को बदलना है:
- व्यापक सिंचाई कवरेज: परियोजना का सबसे प्रमुख लक्ष्य मध्य प्रदेश के एक बड़े कृषि भूभाग को सिंचित करना है। कुल मिलाकर, 1,31,925 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका जिलेवार वितरण इस प्रकार है:
- रायसेन: सर्वाधिक 70,635 हेक्टेयर भूमि, जिससे 243 गाँव लाभान्वित होंगे।
- नरसिंहपुर: 41,100 हेक्टेयर भूमि, जिससे 102 गाँव लाभान्वित होंगे।
- होशंगाबाद (नर्मदापुरम): 20,190 हेक्टेयर भूमि, जिससे 51 गाँव लाभान्वित होंगे।
- उन्नत सिंचाई प्रणाली: परंपरागत नहरों के विपरीत, यह परियोजना माइक्रो-इरिगेशन (सूक्ष्म सिंचाई) की आधुनिक तकनीक पर आधारित है। इसके तहत, भूमिगत पाइपलाइनों का एक सघन नेटवर्क बिछाया जाएगा और 23 मीटर के प्रेशर हेड पर प्रत्येक 2.5 हेक्टेयर के चक तक पानी पहुँचाया जाएगा। इससे किसान स्प्रिंकलर और ड्रिप इरिगेशन जैसी जल-कुशल पद्धतियों का उपयोग कर सकेंगे, जिससे पानी की बचत होगी और फसल उत्पादकता बढ़ेगी।
- जलविद्युत उत्पादन: सिंचाई के अलावा, ऊर्जा उत्पादन भी इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण घटक है। चिंकी और बोरस, दोनों बैराजों पर 25-25 मेगावाट की स्थापित क्षमता वाले जलविद्युत गृहों का निर्माण प्रस्तावित है। इस प्रकार, परियोजना से कुल 50 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन होगा।
- वित्तीय और तकनीकी आयाम:
- अनुमानित लागत: नर्मदा नियंत्रण मंडल द्वारा इस परियोजना के लिए 5839.32 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई है, जिसमें जीएसटी भी शामिल है।
- बैराजों का आकार: चिंकी बैराज लगभग 17 मीटर ऊँचा और 450 मीटर लंबा होगा, जबकि बोरस बैराज 10 मीटर ऊँचा और 630 मीटर लंबा होगा। चिंकी बैराज में 50 फुट ऊँचे और 45 फुट चौड़े 17 गेट लगाए जाएँगे।
- पंप हाउस: परियोजना में जल उद्वहन (लिफ्टिंग) के लिए पांच अलग-अलग स्थानों पर पंप हाउसों का निर्माण किया जाएगा।
एक विवादित इतिहास: निरस्तीकरण से पुनर्जीवन तक
चिंकी-बोरस परियोजना की यात्रा सीधी और सरल नहीं रही है। इसका इतिहास राजनीतिक घोषणाओं, स्थानीय विरोध और प्रशासनिक उलटफेरों से भरा है।
- चुनावी वादा और प्रारंभिक विरोध: इस परियोजना की घोषणा पहली बार 2013 के विधानसभा चुनावों के आसपास हुई थी। हालाँकि, यह घोषणा नर्मदा किनारे बसे समुदायों के लिए चिंता का सबब बन गई। किसानों, आदिवासियों और नर्मदा तट पर रहने वाले साधु-संतों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनका डर था कि बांध बनने से उनकी जमीनें और आजीविका छिन जाएगी। यह विरोध इतना मुखर था कि इसे तत्कालीन भाजपा प्रत्याशी की हार का एक कारण भी माना गया।
- 2016 में निरस्तीकरण: बढ़ते विरोध, नए भूमि अधिग्रहण कानून (2013) के कारण बढ़ती लागत, बड़े पैमाने पर डूब क्षेत्र और वन भूमि के डूबने जैसे कारणों का हवाला देते हुए, मध्य प्रदेश सरकार ने 2016 में इस परियोजना को अव्यवहारिक मानकर निरस्त कर दिया था। यह प्रभावित ग्रामीणों के लिए एक बड़ी जीत थी।
- कोरोना काल में पुनर्जन्म: आश्चर्यजनक रूप से, जिसे एक बार समाप्त मान लिया गया था, उस परियोजना को कोरोना काल के दौरान, वर्ष 2021 में, ठंडे बस्ते से बाहर निकाला गया और पुनः प्रशासनिक स्वीकृति दे दी गई। सरकार ने इस बार इसे “बैराज” का नाम दिया, संभवतः “बांध” शब्द से जुड़े नकारात्मक connotations से बचने के लिए, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह केवल शब्दों का खेल था।
- वर्तमान स्थिति: आज, परियोजना का निर्माण कार्य प्रगति पर है। नर्मदा विकास घाटी प्राधिकरण (NVDA) ने चिंकी बैराज पर काम शुरू कर दिया है, और बोरस बैराज के लिए भी निविदा प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। सरकार ने परियोजना को दिसंबर 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है।
विकास की वेदी पर विस्थापन: डूबते गाँव और अनसुलझे सवाल
किसी भी बड़ी जल परियोजना की तरह, चिंकी-बोरस का सबसे जटिल और संवेदनशील पहलू इसका मानवीय और सामाजिक प्रभाव है। विकास के वादों के दूसरी तरफ विस्थापन का दर्द और अनिश्चितता है।
डूब क्षेत्र का विस्तार और प्रभावित समुदाय:
चिंकी बैराज के निर्माण से नरसिंहपुर जिले की करेली तहसील के दर्जनों गाँव सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। इन गाँवों में पिपरहा, गुरसी, गोकला, रमपुरा, केरपानी, हीरापुर, अमोदा, कुरेला, रोहिणी, झामर, समनापुर, घूरपुर, महादेव पिपरिया आदि शामिल हैं।
इन गाँवों में केवल खेत ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से बसे घर, मंदिर, आश्रम और पूरी जीवन शैली दाँव पर लगी है। यहाँ निवास करने वाली आबादी में नोरिया, ठाकुर, केवट, मल्लाह, कोल और भारिया जैसे आदिवासी और अन्य पारंपरिक समुदाय शामिल हैं, जिनका जीवन और आजीविका सीधे नर्मदा नदी से जुड़ी हुई है। ये समुदाय मछली पकड़ने, नदी किनारे खेती करने और वनोपज पर निर्भर हैं।
भूमि अधिग्रहण: प्रक्रिया पर पारदर्शिता का अभाव
परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है। ग्रामीणों ने लगातार प्रशासन पर अपारदर्शिता और जानकारी छिपाने का आरोप लगाया है।
- अधूरी जानकारी: कई ग्रामीणों, विशेषकर आदिवासी समुदाय के लोगों ने शिकायत की है कि उन्हें यह स्पष्ट रूप से कभी नहीं बताया गया कि उनकी कितनी जमीन डूब में जा रही है। सर्वे करने वाली टीमें उनकी जमीनों पर निशान लगा गईं, लेकिन कोई भी अधिकारी उनसे सीधे संवाद करने या उनके सवालों का जवाब देने को तैयार नहीं था।
- दबाव और धमकी: ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि तहसील कार्यालय में उनसे बिना पूरी जानकारी दिए कागजों पर हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान ले लिए गए। विरोध करने पर उन्हें एकतरफा कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
- लोक सुनवाई की औपचारिकता: नवंबर 2022 में परियोजना के लिए एक लोक सुनवाई का आयोजन किया गया था, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उनका पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं सुना गया। अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि बैराज का बनना तय है और उन्हें केवल अपनी आपत्तियों को दर्ज कराना चाहिए।
मुआवजा और पुनर्वास: वादे और वास्तविकता के बीच की खाई
सरकार का दावा है कि विस्थापितों के पुनर्वास और मुआवजे के लिए पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं। नर्मदा विकास प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार, पुनर्वास के लिए 239 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई है और एक पुनर्वास कॉलोनी बनाने की भी योजना है। हालाँकि, जमीन पर स्थिति चिंताजनक है।
- मुआवजे की दर पर भ्रम: किसानों की सबसे बड़ी चिंता मुआवजे की दर को लेकर है। उन्हें डर है कि उनकी उपजाऊ जमीन का बेहद कम मूल्य दिया जाएगा, जो बाजार दर से काफी कम होगा।
- “जमीन के बदले जमीन” की मांग: कई प्रभावित किसान पैसे के बजाय “जमीन के बदले जमीन” की मांग कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि पैसे से वे वैसी उपजाऊ जमीन नहीं खरीद पाएंगे जैसी उनके पास है।
- आधुनिक डिजाइन का दावा बनाम जमीनी हकीकत: प्राधिकरण का दावा है कि परियोजना को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि डूब क्षेत्र न्यूनतम हो। एक रिपोर्ट के अनुसार, केवल 830 हेक्टेयर निजी भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा और किसी भी गाँव को विस्थापित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यह दावा उन ग्रामीणों के अनुभवों के बिल्कुल विपरीत है, जिनके घरों के पास तक निशानदेही की गई है और जिन्हें अपनी पूरी जमीन डूब जाने का डर है। यह विरोधाभास ग्रामीणों और प्रशासन के बीच अविश्वास को और गहरा करता है।
विरोध के स्वर: अपनी धरती बचाने का संघर्ष
प्रशासन के आश्वासनों के बावजूद, प्रभावित गाँवों में विरोध लगातार जारी है।
- धरना और प्रदर्शन: घूरपुर जैसे गाँवों में, ग्रामीण महीनों तक धरने पर बैठे रहे, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल थीं। उनकी मांगें स्पष्ट थीं – प्रक्रिया में पारदर्शिता, उचित मुआवजा और जमीन के बदले जमीन।
- एकतरफा संवाद का आरोप: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि प्रशासन उनसे सीधा संवाद करने के बजाय केवल पंचायत भवनों में नोटिस चस्पा करने जैसी औपचारिकताएं कर रहा है, जो एकतरफा संवाद का प्रतीक है।
- विकास बनाम विनाश का द्वंद्व: प्रभावित लोगों के लिए, यह परियोजना विकास नहीं, बल्कि विनाश का पर्याय है। उनका तर्क है कि जिस सिंचाई के लाभ की बात की जा रही है, वह उन क्षेत्रों में पहुँचाई जाएगी जहाँ किसानों के पास पहले से ही सिंचाई के साधन मौजूद हैं, जबकि उनकी अपनी उपजाऊ भूमि हमेशा के लिए छीन ली जाएगी।
निष्कर्ष: संतुलन की तलाश
चिंकी-बोरस बैराज संयुक्त बहुउद्देशीय परियोजना विकास के उस दोधारी तलवार का सटीक उदाहरण है, जिसकी एक धार प्रगति और समृद्धि का वादा करती है, तो दूसरी धार विस्थापन और सामाजिक अशांति पैदा करती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि 1.31 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को सिंचित करने और 50 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को एक नई गति दे सकती है। आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली पानी के उपयोग में क्रांति ला सकती है और किसानों को मानसून की अनिश्चितताओं से राहत दिला सकती है।
लेकिन, इन भव्य आंकड़ों और तकनीकी उपलब्धियों के पीछे उन हजारों लोगों की कहानियाँ हैं, जिनकी दुनिया नर्मदा के किनारे ही बसती है। उनकी जमीनें, उनके घर, उनकी संस्कृति और उनकी आजीविका, सब कुछ दाँव पर है। परियोजना की सफलता केवल इसके कंक्रीट के ढाँचों के निर्माण या मेगावाट और हेक्टेयर के लक्ष्यों को प्राप्त करने में नहीं है। इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विकास की प्रक्रिया कितनी समावेशी, पारदर्शी और मानवीय है।
सरकार और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के लिए यह अनिवार्य है कि वे प्रभावित समुदायों के साथ एक सार्थक और ईमानदार संवाद स्थापित करें, उनकी चिंताओं को सुनें और उनका सम्मानजनक समाधान करें। भूमि अधिग्रहण और मुआवजे की प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी बनाना होगा, और “जमीन के बदले जमीन” जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना होगा। यदि विकास की इस दौड़ में सबसे कमजोर और हाशिए पर मौजूद समुदायों को पीछे छोड़ दिया जाता है, तो यह परियोजना अपने महान उद्देश्यों के बावजूद, एक अधूरी और अन्यायपूर्ण गाथा बनकर रह जाएगी। भविष्य ही बताएगा कि चिंकी-बोरस परियोजना मध्य प्रदेश के लिए एक वरदान साबित होती है या विस्थापन के दर्द का एक और अध्याय।